मेरे हम-नफ़स, मेरे हम-नवा, मुझे दोस्त बनके दग़ा न देमैं हूँ दर्द-ए-इश्क़ से जाँवलब, मुझे ज़िन्दगी की दुआ न दे
मेरे दाग़-ए-दिल से है रौशनी, उसी रौशनी से है ज़िन्दगीमुझे डर है अये मेरे चारागर, ये चराग़ तू ही बुझा न दे
मुझे छोड़ दे मेरे हाल पर, तेरा क्या भरोसा है चारागरये तेरी नवाज़िश-ए-मुख़्तसर, मेरा दर्द और बढ़ा न दे
मेरा अज़्म इतना बलंद है के पराये शोलों का डर नहींमुझे ख़ौफ़ आतिश-ए-गुल से है, ये कहीं चमन को जला न दे
वो उठे हैं लेके होम-ओ-सुबू, अरे ओ 'शकील' कहाँ है तू तेरा जाम लेने को बज़्म में कोई और हाथ बढ़ा न दे
Wednesday, December 17, 2008
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment