मैं मधुबाला मधुशाला की,मैं मधुशाला की मधुबाला!मैं मधु-विक्रेता को प्यारी,मधु के धट मुझ पर बलिहारी,प्यालों की मैं सुषमा सारी,मेरा रुख देखा करती हैमधु-प्यासे नयनों की माला।मैं मधुशाला की मधुबाला!
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इस नीले अंचल की छायामें जग-ज्वाला का झुलसायाआकर शीतल करता काया,मधु-मरहम का मैं लेपन करअच्छा करती उर का छाला।मैं मधुशाला की मधुबाला!
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मधुघट ले जब करती नर्तन,मेरे नुपुर की छम-छननमें लय होता जग का क्रंदन,झूमा करता मानव जीवनका क्षण-क्षण बनकर मतवाला।मैं मधुशाला की मधुबाला!
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मैं इस आंगन की आकर्षण,मधु से सिंचित मेरी चितवन,मेरी वाणी में मधु के कण,मदमत्त बनाया मैं करती,यश लूटा करती मधुशाला।मैं मधुशाला की मधुबाला!
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था एक समय, थी मधुशाला,था मिट्टी का घट, था प्याला,थी, किन्तु, नहीं साकीबाला,था बैठा ठाला विक्रेतादे बंद कपाटों पर ताला।मैं मधुशाला की मधुबाला!
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तब इस घर में था तम छाया,था भय छाया, था भ्रम छाया,था मातम छाया, गम छाया,ऊषा का दीप लिये सर पर,मैं आई करती उजियाला।मैं मधुशाला की मधुबाला!
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सोने सी मधुशाला चमकी,माणित दॿयॿति से मदिरा दमकी,मधुगंध दिशाओं में चमकी,चल पड़ा लिये कर में प्यालाप्रत्येक सुरा पीनेवाला।मैं मधुशाला की मधुबाला!
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थे मदिरा के मृत-मूक घड़े,थे मूर्ति सदृश मधुपात्र खड़े,थे जड़वत प्याले भूमि पड़े,जादू के हाथों से छूकरमैंने इनमें जीवन डाला।मैं मधुशाला की मधुबाला!
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मझको छूकर मधुघट छलके,प्याले मधु पीने को ललके ,मालिक जागा मलकर पलकें,अंगड़ाई लेकर उठ बैठीचिर सुप्त विमूर्छित मधुशाला।मैं मधुशाला की मधुबाला!
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प्यासे आि, मैंने आिका,वातायन से मैंने िािका,पीनेवालों का दल बहका,उत्कंठित स्वर से बोल उठा,‘कर दे पागल, भर दे प्याला!’मैं मधुशाला की मधुबाला!
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खॿल द्वार मदिरालय के,नारे लगते मेरी जय के,मिटे चिन्ह चिंता भय के,हर ओर मचा है शोर यही,‘ला-ला मदिरा ला-ला’!,मैं मधुशाला की मधुबाला!
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हर एक तृप्ति का दास यहां,पर एक बात है खास यहां,पीने से बढ़ती प्यास यहां,सौभाग्य मगर मेरा देखो,देने से बढ़ती है हाला!मैं मधुशाला की मधुबाला!
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चाहे जितना मैं दूं हाला,चाहे जितना तू पी प्याला,चाहे जितना बन मतवाला,सुन, भेद बताती हूँ अंतिम,यह शांत नही होगी ज्वाला।मैं मधुशाला की मधुबाला!
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मधु कौन यहां पीने आता,है किसका प्यालों से नाता,जग देख मुझे है मदमाता,जिसके चिर तंद्रिल नयनों परतनती मैं स्वपनों का जाला।मैं मधुशाला की मधुबाला!
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यह स्वप्न-विनिर्मित मधुशाला,यह स्वप्न रचित मधु का प्याला,स्वप्निल तृष्णा, स्वप्निल हाला,स्वप्नों की दुनिया में भूला फिरता मानव भोलाभाला।मैं मधुशाला की मधुबाला!